: आचार्य श्री के प्रथम समाधि स्मृति दिवस पर मुनी श्री के सानीध्य में आचार्य छत्तीसी विधान संपन्न
admin
Thu, Feb 6, 2025
आचार्य श्री के प्रथम समाधि स्मृति दिवस पर मुनी श्री के सानीध्य में आचार्य छत्तीसी विधान संपन्न
दमोह। संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रथम समाधि स्मृति दिवस के अवसर पर देशभर में विविध धार्मिक सामाजिक आयोजन किए गए। इसी कड़ी में दमोह के श्री पारसनाथ दिगंबर जैन नन्हे मंदिर जी में आचार्य श्री समय सागर जी के शिष्य मुनि श्री प्रयोग सागर जी के सानिध्य में प्रथम समाधि स्मृति दिवस भक्ति भाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर जैन धर्मशाला में आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम श्रृंखला तहत गुरुवार को प्रातः बेला में श्री जी के अभिषेक शांति धारा उपरांत भक्ति भाव के साथ आचार्य छत्तीसी विधान करते हुए आचार्य के 36 मूल गुणों के अर्घ्य समर्पित किए गए।
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इसके पूर्व मुनि श्री प्रयोग सागर जी के मुखारविंद से चार शांति धारा संपन्न हुई। प्रथम शांति धारा का सौभाग्य सुदेश जैन परिवार, द्वितीय शांति धारा पत्रकार राजेंद्र अटल परिवार, तृतीय शांति धारा आनंद लैब परिवार तथा चतुर्थ शांति धारा का सौभाग्य महेश दिगंबर परिवार को प्राप्त हुआ। पांच कलश स्थापना कर श्रावक श्रेस्ठि बनकर पूजन का सौभाग्य अभय बनगांव परिवार, संतोष सिंघई परिवार, नेमचंद बजाज परिवार, डॉ गौरव राकेश नायक परिवार, रानू पदम खजरी परिवार को प्राप्त हुआ। मुनि श्री को शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य मुकेश जैन हटा सहित अन्य परिवार को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री प्रयोग सागर जी महाराज ने कहां की उन्होंने आचार श्री शांति सागर जी महाराज से लेकर आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज को नही देखा लेकिन उनके बारे में जो अध्ययन किया जो सुना उसके आधार पर यह कह सकता हूं कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज में पूर्ववर्ती सभी आचार्य के के गुण समाहित थे। शिष्यों से लेकर भक्तों की प्रति उनका उदार रवैया सभी को धर्म पथ पर निरंतर अग्रेषित होने प्रेरित करता रहता था। मुनि श्री ने कहा कि गुरु के उपकार की कोई कीमत नही होती। सारी दुनिया की दौलत देकर भी गुरु का उपकार नहीं चुकाया जा सकता। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षा के बाद के वर्षों में मिले सानिध्य के दौरान के अनेक प्रसंग मुनि श्री ने सुनाए।
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आसमान में उड़ने वाली पतंग का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने भक्त तथा शिष्य के बीच का अंतर बतलाया। उन्होंने कहा भक्त भगवान से मांगता रहता है। लेकिन शिष्य को गुरु से कभी भी कुछ नही मांगता। उसे गुरु जो दे देता है उससे वह सहज स्वीकार कर लेता है। तथा जीवन भर गुरु के दिए नियम और वचनों का पालन करता है। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज मैं अपने शिष्यों को अपने भक्तों को धर्मपथ का मार्ग दिखाकर जो शिक्षा दी जो प्रेरणा दी उसी का नतीजा है कि संपूर्ण बुंदेलखंड से लेकर देश प्रदेश में धर्म पता का फहरा रही है तथा आगे भी फ़हराती रहेगी। इस अवसर पर वैज्ञानिक संत निर्भय सागर महाराज के दो मुनि राजो का सानिध्य भी सभी को प्राप्त हुआ।
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इसके पूर्व मुनि श्री प्रयोग सागर जी के मुखारविंद से चार शांति धारा संपन्न हुई। प्रथम शांति धारा का सौभाग्य सुदेश जैन परिवार, द्वितीय शांति धारा पत्रकार राजेंद्र अटल परिवार, तृतीय शांति धारा आनंद लैब परिवार तथा चतुर्थ शांति धारा का सौभाग्य महेश दिगंबर परिवार को प्राप्त हुआ। पांच कलश स्थापना कर श्रावक श्रेस्ठि बनकर पूजन का सौभाग्य अभय बनगांव परिवार, संतोष सिंघई परिवार, नेमचंद बजाज परिवार, डॉ गौरव राकेश नायक परिवार, रानू पदम खजरी परिवार को प्राप्त हुआ। मुनि श्री को शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य मुकेश जैन हटा सहित अन्य परिवार को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री प्रयोग सागर जी महाराज ने कहां की उन्होंने आचार श्री शांति सागर जी महाराज से लेकर आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज को नही देखा लेकिन उनके बारे में जो अध्ययन किया जो सुना उसके आधार पर यह कह सकता हूं कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज में पूर्ववर्ती सभी आचार्य के के गुण समाहित थे। शिष्यों से लेकर भक्तों की प्रति उनका उदार रवैया सभी को धर्म पथ पर निरंतर अग्रेषित होने प्रेरित करता रहता था। मुनि श्री ने कहा कि गुरु के उपकार की कोई कीमत नही होती। सारी दुनिया की दौलत देकर भी गुरु का उपकार नहीं चुकाया जा सकता। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षा के बाद के वर्षों में मिले सानिध्य के दौरान के अनेक प्रसंग मुनि श्री ने सुनाए।
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आसमान में उड़ने वाली पतंग का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने भक्त तथा शिष्य के बीच का अंतर बतलाया। उन्होंने कहा भक्त भगवान से मांगता रहता है। लेकिन शिष्य को गुरु से कभी भी कुछ नही मांगता। उसे गुरु जो दे देता है उससे वह सहज स्वीकार कर लेता है। तथा जीवन भर गुरु के दिए नियम और वचनों का पालन करता है। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज मैं अपने शिष्यों को अपने भक्तों को धर्मपथ का मार्ग दिखाकर जो शिक्षा दी जो प्रेरणा दी उसी का नतीजा है कि संपूर्ण बुंदेलखंड से लेकर देश प्रदेश में धर्म पता का फहरा रही है तथा आगे भी फ़हराती रहेगी। इस अवसर पर वैज्ञानिक संत निर्भय सागर महाराज के दो मुनि राजो का सानिध्य भी सभी को प्राप्त हुआ।Tags :
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