प्रदेश की राजस्व न्याय-व्यवस्था पर हालिया आंकड़े एक चौंकाने वाली तस्वीर : राजस्व न्याय-व्यवस्था पर बड़ा सवाल: आंकड़े दिखाते हैं कि तहसीलदार, कलेक्टर और एसडीएम से कहीं बेहतर, फिर भी सरकारी प्रयोगों
Jankranti Express
Wed, Aug 13, 2025
राजस्व न्याय-व्यवस्था पर बड़ा सवाल: आंकड़े दिखाते हैं कि तहसीलदार, कलेक्टर और एसडीएम से कहीं बेहतर, फिर भी सरकारी प्रयोगों से परेशान..
प्रदेश की राजस्व न्याय-व्यवस्था पर हालिया आंकड़े एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश करते हैं. मप्र में तहसीलदार और नायब तहसीलदार, जो राजस्व मामलों की रीढ़ हैं, अपने वरिष्ठ अधिकारियों (कलेक्टर और एसडीएम) की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावी ढंग से काम कर रहे हैं. इसके बावजूद, राज्य सरकार के नए अव्यवहारिक प्रयोगों से सबसे बेहतर काम करने वाला यहीं कैडर परेशान और हतोत्साहित है.

आंकड़ों के अनुसार, तहसीलदार न्यायालयों का प्रकरण निराकरण प्रतिशत 72.55 प्रतिशत है, जबकि एसडीएम न्यायालयों का 60.27 प्रतिशत और कलेक्टर न्यायालयों का मात्र 32.68 प्रतिशत है. यह तब है जब तहसीलदार प्रदेश में सबसे अधिक (लगभग 14.7 लाख) प्रकरणों का बोझ संभालते हैं.पांच साल से ज्यादा पुराने लंबित मामले भी तहसीलदारों के पास सबसे कम (केवल 210) हैं, जबकि आयुक्त स्तर पर यह आंकड़ा 11,728 है.इन तथ्यों के बावजूद, राज्य सरकार द्वारा राजस्व अधिकारियों को न्यायिक और गैर-न्यायिक कार्यों में विभाजित करने का नया प्रयोग किया जा रहा है,

जिसका कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने पुरजोर विरोध भी किया है. यह निर्णय सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले कैडर पर ही सवाल उठाने और उन्हें अव्यवस्थित करने जैसा है.सवाल यह उठता है कि जब जमीनी स्तर पर अधिकारी शानदार काम कर रहे हैं, तो उन पर ऐसे प्रयोग क्यों थोपे जा रहे हैं? सरकार को इन आंकड़ों का संज्ञान लेकर अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए और सुधार वहां करना चाहिए, जहां प्रदर्शन वास्तव में कमजोर है.
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