सज्जन पुरुष सत्य पर न चल सकें, लेकिन सत्य को कहने से नहीं चूकते : जगत के संकटों से रक्षा करना है, तो मौन धारण करो। बोलना एक कला है, परन्तु मौन रहना एक महाकला है - पट्टाचार्य 108 भी विशुद
Jankranti Express
Mon, Sep 1, 2025
सज्जन पुरुष सत्य पर न चल सकें, लेकिन सत्य को कहने से नहीं चूकते - पट्टाचार्य 108 भी विशुद्धसागर जी
जगत के संकटों से रक्षा करना है, तो मौन धारण करो। बोलना एक कला है, परन्तु मौन रहना एक महाकला है - पट्टाचार्य 108 भी विशुद्धसागर जी
विरागोदय तीर्थ क्षेत्र पथरिया में धर्म सभा का आयोजन
पथरिया - दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के उन्नायक पट्टाचार्य 108 भी विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने विरागोदय तीर्थ क्षेत्र पथरिया में धर्म-सभा में सम्बोधन करते हुए कहा सत्य सुनो, सत्य गुणो, सत्य जानो, सत्य मानो और सत्य का आचरण करो। कुटिल- कटु भाषण, पीड़ा कारक वचन ही असत्य है।" दूसरों के दुःख के कारणभूत वचनों को छोड़कर स्व-पर हितकारी वचन कहना ही सत्यधर्म' है। सत्य वचन बोलना, झूठ नहीं बोलना, यही सत्यवादी है। परभावों का सर्वथा त्याग और निजात्मा में लीनता ही निश्चय से 'सत्यव्रत' है। मन-वचन- काय से असत्य नहीं बोलना, न दूसरों से बुलवाना और न असत्यभाषी की अनुमोदना करना, सत्य महाव्रत है ।

सज्जन पुरुष सत्य पर न चल सकें, लेकिन सत्य को कहने से नहीं चूकते। सत्य-भाषण सज्जन पुरुष की पहचान है। जो हितकारी वचन हैं, वही सत्य वचन हैं। जो किसी का अहित करें, वे असत्य ही हैं। शस्त्र का घाव तो समय पाकर भर जाता है, परन्तु कटु वचनों का घाव हमेशा हरा रहता है। सत्यप्रिय सज्जनों का सभी सम्मान करते हैं। बोलो तो हित ,मित, प्रिय वचन बोलो। सीमित बोलो, काम का बोलो। वहीं बोलो जिससे यश, धर्म की वृद्धि हो। जिससे जीवों की रक्षा हो, जिससे जीवों का कल्याण हो, वही बोलना चाहिए। जगत के संकटों से रक्षा करना है, तो मौन धारण करो। बोलना एक कला है, परन्तु मौन रहना एक महाकला है। मौनधारी को ही वचनासिद्धि होती है। सत्यवादी अहिंसक होता है। सत्य को जानो, क्योंकि सत्यार्थ को जाने बिना सत्य-जीवन कैसे जियोगे । स्व-पर हितकारी वचन ही श्रेष्ठ हैं। पर के घातक वचन असत्य ही होते हैं।
प्रिय होने पर सत्य हो, ये जरूरी नहीं है, पर जो सत्य होता वह प्रिय ही होता है। किसी के प्राण संकट में पड़ जायें, वह सत्य होकर भी असत्य ही है। सत्य ही श्रेष्ठ है, सत्य ही सुन्दर है। सत्य का जीवन ही अनुकरणीय, स्तुत्य होता है। सत्य ही की विजय है। जहाँ सत्य होता है, वहाँ प्रशंसा स्वयमेव मिल जाती है। सत्य स्वयमेव ही प्रचारित हो जाता है। उक्त जानकारी सजल जैन ने दी
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