विरागोदय तीर्थधाम (पथरिया) में राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का शुभारम्भ
पथरिया - विरागोदय तीर्थधाम (पथरिया) में दिनांक 12 सितम्बर को प्रातः त्रि-दिवसीय विद्वत-संगोष्ठी का मंगलमय शुभारंभ परम पूज्य पट्टाचार्य 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव के (ससंघ) सानिध्य में हुआ।
"राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी" में देश के विभिन्न राज्यों से लगभग 25 विद्वान-मनीषी, 25 ब्रह्मचारी भैया जी ने सहभागिता की।
सर्वप्रथम हुआ दीप प्रज्ज्वलन मंगलाचरण-
उपस्थित अतिथि विद्वान् डॉ. श्रेयांश जी बड़ौत (उ.प्र.), डॉ. बम्हौरी, डॉ.आशीष जी शिक्षाचार्य दमोह, डॉ. श्री आशीष जी बम्हौरी, डॉ. ज्योति जैन खतौली (उ.प्र.), डॉ. भी आशीष जैन शाहगढ़, डॉ. श्री धर्मेन्द्र जैन जयपुर (राज.), भट्टारक डॉ.जयंत कीर्ति जी उज्जैन, इंजी. दिनेश जी भिलाई (छ.ग.),डॉ. आनंद जी वाराणसी, डॉ. अल्पना जी ग्वालियर, डॉ. श्रीयांश सिंघई जी जयपुर, डॉ. अशोक जी वाराणसी आदि ने प्रथम सत्र का उद्घाटन किया।
श्रेष्ठीयों ने की सह-भागिता -
"राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी " में श्रेष्ठी नरेन्द्र जी गुरु कृपा' रायपुर,अरुण जी अहमदावाद,आलोक जी विरागोदय तीर्थधाम अध्यक्ष,विपिन चौधरी राजेश जी रज्जन,अनिल जी कुबेर,अमित बजाज,राजा वारदाना,रवि बांसा,संजय जी पत्रकार, सजल जी पथरिया आदि उपस्थित रहे।
"ग्रंथराज" पृच्छना-देशना" का विमोचन"-
"राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी" के शुभारंभ सत्र में राजर्षि अमोघ वर्ष कृत " प्रश्नोत्तर रत्नमालिका" पर प्रदत्त पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी कृत" पृच्छना-देशना" का लोकार्पण हुआ।
"पृच्छना-देशना" जैन नीतिशास्त्र है, जिसका संकलन श्रुतसंवेगी मुनि भी सुव्रतसागर जी ने किया है। 700 पृष्ठीय उक्त कृति का सम्पादन डॉ. भी श्रेयांश कुमार जी बड़ौत ने किया है।
संगोष्ठी- संयोजन -
"पृच्छना-देशना" नीति शास्त्र पर आयोजित "राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी" की अध्यक्षता प्रोफेसर डॉ. श्रीयांस सिंघई जी जयपुर ने किया। संगोष्ठी का संयोजन डॉ.श्रेयांस जैन बड़ौत ने की, जो अखिल भारतीय शास्त्री परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष है।
त्रि-दिवसीय ज्ञान यज्ञ प्रारम्भ -
'विरागोदय तीर्थ धाम" पर पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी गुरुदेव, 25 दिगम्बर मुनिराज, २८ ब्रह्मचारी, 25 विद्वानों के मध्य तीन दिन तक जैन- नीति पर मीमांसा,गवेषणा होगी। सम्पूर्ण कार्यक्रम "विशुद्ध-देशना" पर 'लाइव प्रसारण किया जाएगा।
नीतिः आनन्द की जननी
पट्टाचार्य 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने "राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी" में सम्बोधन करते हुए कहा कि- सु-नीति आनन्द की जननी है। नीतिज्ञ मनुष्य ही इस लोक एवं परलोक में परमानन्द को प्राप्त करता है। नीति पूर्ण जीवन ही श्रेष्ठ, सफल, समृद्ध एवं सुखद् होता है। जो सुख प्रदान करे, वही सच्ची-नीति है। यथार्थ बुख वहीं है, जो दुःख का कारण बने।
सम्राट् नीति से ही राज्य चलाता है। संत अध्यात्म-नीति से उपसर्ग- परीषहों को सहन करते हैं। अल्प-साधनों से भी उन्नति पाना है, तो नीति का का ज्ञान होना चाहिए। न्याय-पूर्ण नीति ही उत्कर्ष प्रदान करती है। नीति कुलीन-नरों की कुल - विद्या है। नीति सुखद-जीवन की आधार है। नीति विकास की कुंजी है। नीति शांति का द्वार है।
व्यक्ति को जीवन में सफलता पाना है, तो सर्व-प्रथम रीति-नीति का यथार्थ-बोध होना चाहिए। रीति-नीति का कुशल-साता ही दुनिया पर शासन कर सकता है।